उदयपुर। भारत की समृद्ध जनजातीय संस्कृति, परंपराओं, लोक जीवन और साहित्य को अकादमिक मंच पर नई पहचान दिलाने के उद्देश्य से राजस्थान के उदयपुर में दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया जा रहा है। मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय, उदयपुर के हिंदी विभाग की ओर से 27 एवं 28 नवंबर 2026 को इस राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया जाएगा। संगोष्ठी का मुख्य विषय ‘भारत की जनजातियाँ : लोक जीवन, साहित्य और समाज’ रखा गया है। इस आयोजन में देशभर के शिक्षकों, शोधार्थियों, साहित्यकारों, विद्यार्थियों और जनजातीय संस्कृति के अध्येताओं को आमंत्रित किया गया है।

मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय का प्रवेश द्वार, सफेद संगमरमर की संरचना के साथ, एक मूर्ति से सुसज्जित।

इस राष्ट्रीय संगोष्ठी का उद्देश्य भारत की विभिन्न जनजातियों के सामाजिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक और ऐतिहासिक पक्षों पर गंभीर अकादमिक चर्चा करना है। भारत में जनजातीय समुदायों की अपनी विशिष्ट जीवनशैली, लोक परंपराएं, भाषाएं, रीति-रिवाज, कला और साहित्यिक विरासत रही है। इन परंपराओं का भारतीय संस्कृति और सामाजिक संरचना में महत्वपूर्ण योगदान है। ऐसे में संगोष्ठी के माध्यम से जनजातीय समाज की विविधता और उसकी सांस्कृतिक पहचान को समझने का अवसर मिलेगा।

लोक जीवन और साहित्य पर होगा विशेष विमर्श

संगोष्ठी का प्रमुख केंद्र जनजातीय समुदायों का लोक जीवन, उनकी मौखिक परंपराएं, लोकगीत, लोककथाएं, लोकनृत्य और साहित्यिक अभिव्यक्तियां होंगी। इसके साथ ही जनजातीय समाज की सामाजिक संरचना, पारंपरिक ज्ञान, सांस्कृतिक विरासत और समकालीन चुनौतियों पर भी शोधपरक चर्चा की जा सकेगी।

जनजातीय समुदायों का साहित्य भारतीय साहित्यिक परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। उनकी मौखिक अभिव्यक्तियों और सांस्कृतिक अनुभवों में प्रकृति, सामुदायिक जीवन, परंपरा और सामाजिक संबंधों की विशेष झलक देखने को मिलती है। इस विषय पर शोध और संवाद के माध्यम से जनजातीय साहित्य को व्यापक अकादमिक पहचान दिलाने की दिशा में प्रयास किया जाएगा।

शोधार्थियों और शिक्षाविदों के लिए अवसर

इस आयोजन में देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों से जुड़े प्राध्यापक, शोधार्थी तथा स्वतंत्र शोधकर्ता भाग ले सकेंगे। संगोष्ठी में प्रस्तुत किए जाने वाले शोध-पत्रों के माध्यम से जनजातीय समाज से जुड़े नए शोध, विचार और अनुभव सामने आने की उम्मीद है।

आयोजकों की ओर से साझा की गई सूचना के अनुसार, संगोष्ठी में चयनित शोध-पत्रों का प्रकाशन भी किया जाएगा। इससे शोधार्थियों और युवा शिक्षाविदों को अपने शोध कार्य को प्रकाशित कराने का महत्वपूर्ण अवसर मिलेगा।

ऑनलाइन पंजीकरण की सुविधा

राष्ट्रीय संगोष्ठी में भाग लेने के इच्छुक प्रतिभागियों के लिए ऑनलाइन पंजीकरण की व्यवस्था की गई है। इसके लिए गूगल फॉर्म का लिंक जारी किया गया है।

पंजीकरण लिंक:https://forms.gle/BANgP8HegHL5AnD77

आयोजन से संबंधित अधिक जानकारी और पंजीकरण के लिए इच्छुक प्रतिभागी दिए गए लिंक का उपयोग कर सकते हैं।

जनजातीय संस्कृति को मिलेगा अकादमिक मंच

दो दिवसीय यह राष्ट्रीय संगोष्ठी जनजातीय समाज की सांस्कृतिक पहचान, साहित्यिक योगदान और सामाजिक जीवन को समझने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल साबित हो सकती है। साथ ही, यह आयोजन देश के विभिन्न हिस्सों से आने वाले विद्वानों और शोधार्थियों को विचारों के आदान-प्रदान तथा शोध अनुभव साझा करने का अवसर प्रदान करेगा।

जनजातीय समुदायों की परंपराओं, ज्ञान और साहित्यिक विरासत को संरक्षित करने तथा नई पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए इस तरह के अकादमिक आयोजन महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

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