जनजातीय गौरव दिवस के उपलक्ष्य में वसंत कन्या महाविद्यालय में ‘कांतारा: अ लीजेंड’ का विशेष प्रदर्शन इतिहास विभाग द्वारा ‘इतिहास दर्पण – चलचित्र अभिलेख’ पहल के अंतर्गत फिल्म प्रदर्शन एवं अकादमिक परिचर्चा का आयोजन वाराणसी, 4 नवम्बर 2026। वसंत कन्या महाविद्यालय, कामाच्छा, वाराणसी (बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से संबद्ध) के इतिहास विभाग द्वारा जनजातीय गौरव दिवस के उपलक्ष्य में 4 नवम्बर 2026 को ‘इतिहास दर्पण – चलचित्र अभिलेख’ पहल के अंतर्गत विशेष फिल्म प्रदर्शन एवं अकादमिक परिचर्चा का आयोजन किया गया। महाविद्यालय के सेमिनार हॉल में आयोजित इस कार्यक्रम में विभिन्न विभागों की छात्राओं एवं शिक्षकों ने उत्साहपूर्वक सहभागिता की। कार्यक्रम का शुभारंभ महाविद्यालय की प्राचार्या प्रो. आशा यादव के उद्घाटन संबोधन से हुआ। उन्होंने इतिहास, संस्कृति और सामाजिक विरासत को समझने के लिए ऐसे शैक्षणिक एवं रचनात्मक आयोजनों के महत्व पर प्रकाश डाला। इतिहास विभाग की अध्यक्ष प्रो. पूनम पाण्डेय ने अपने संबोधन में कहा कि इतिहास का अध्ययन केवल पाठ्यपुस्तकों और लिखित स्रोतों तक सीमित नहीं है, बल्कि लोक परंपराओं, सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों और समुदायों की ऐतिहासिक स्मृतियों को समझना भी इसका महत्वपूर्ण पक्ष है। इसके पश्चात ‘कांतारा: अ लीजेंड’ फिल्म का प्रदर्शन किया गया। फिल्म प्रदर्शन के उपरांत ‘स्रोत, संदर्भ और संवाद’ विषय पर अकादमिक परिचर्चा आयोजित हुई। परिचर्चा में फिल्म के माध्यम से प्रस्तुत आदिवासी समाज, उसकी सांस्कृतिक परंपराओं, भूमि, आस्था और सामुदायिक पहचान से जुड़े प्रश्नों पर विचार-विमर्श किया गया। शैक्षिक खबरों से अपडेट रहने के लिए The Campus News के व्हाट्स एप चैनल को फॉलो कीजिए। चर्चा के दौरान औपनिवेशिक वन कानूनों, आरक्षित वनों की अवधारणा तथा वन और भूमि पर समुदायों के पारंपरिक अधिकारों के प्रश्न को विशेष रूप से रेखांकित किया गया। साथ ही यह विचार किया गया कि औपनिवेशिक शासन से लेकर स्वतंत्रता के बाद तक राज्य और आदिवासी समुदायों के बीच संबंधों में किस प्रकार परिवर्तन आए हैं। फिल्म में भूत कोला की परंपरा, लोक आस्था और सांस्कृतिक स्मृति के चित्रण के साथ-साथ विकास, सत्ता, पहचान और सामुदायिक अधिकारों के अंतर्संबंधों पर भी चर्चा हुई। छात्राओं ने फिल्म में प्रस्तुत कथानक और ऐतिहासिक-सामाजिक वास्तविकताओं के बीच संबंधों को समझने का प्रयास किया। कार्यक्रम के समापन पर इसकी संयोजक डॉ. स्वेता सिंह ने परिचर्चा के प्रमुख बिंदुओं का सार प्रस्तुत करते हुए धन्यवाद ज्ञापन किया। उन्होंने कहा कि सिनेमा इतिहास को समझने और उस पर प्रश्न उठाने का एक प्रभावशाली माध्यम हो सकता है, बशर्ते उसे आलोचनात्मक दृष्टि से देखा और परखा जाए। इस आयोजन का उद्देश्य छात्राओं को कक्षा में पढ़ाए जा रहे जनजातीय इतिहास और औपनिवेशिक भारत में हाशिये के समुदायों से संबंधित विषयों को समकालीन सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भों से जोड़ना था। कार्यक्रम ने सिनेमा को अकादमिक विमर्श से जोड़ते हुए छात्राओं में ऐतिहासिक दृष्टि, संवाद और आलोचनात्मक चिंतन को प्रोत्साहित किया। कार्यक्रम के सफल संचालन में छात्र संयोजक ऐंदवी त्रिपाठी, सृष्टि सिंह, तृप्ति सिंह एवं अन्नुक्ता गजमेर का महत्वपूर्ण योगदान रहा। Share this: Share on X (Opens in new window) X Share on Facebook (Opens in new window) Facebook Like this:Like Loading… Related पोस्ट नेविगेशन विकसित भारत युवा संसद प्रतियोगिता का हुआ आयोजन IGNTU में शिक्षकों और शोधार्थियों के लिए 12 ऑनलाइन प्रशिक्षण कार्यक्रमों का आयोजन