भारत-पाकिस्तान विभाजन पर साहित्य और शोध में अब तक महिलाओं, विस्थापन, हिंसा और सांप्रदायिक संघर्षों पर अधिक चर्चा हुई है, लेकिन उस दौर में बच्चों ने जो मानसिक, सामाजिक और पारिवारिक त्रासदी झेली, वह आज भी साहित्य और अकादमिक विमर्श में अपेक्षित स्थान नहीं पा सकी है। इसी अनदेखे पहलू को सामने लाने के उद्देश्य से भारतीय उपमहाद्वीप के विभाजन साहित्य में बच्चों की भूमिका और उनके अनुभवों पर केंद्रित एक नई संपादित पुस्तक की पहल की जा रही है। भारत-पाकिस्तान का विभाजन केवल भौगोलिक सीमाओं का बंटवारा नहीं था, बल्कि इसने करोड़ों लोगों के जीवन, परिवार, रिश्तों और पहचान को प्रभावित किया था। इस ऐतिहासिक त्रासदी का सबसे संवेदनशील पक्ष बच्चों का अनुभव रहा, जिन्हें विस्थापन, हिंसा, असुरक्षा और पारिवारिक बिखराव जैसी परिस्थितियों से गुजरना पड़ा। इसके बावजूद विभाजन पर उपलब्ध अधिकांश साहित्य और शोध में बच्चों के दृष्टिकोण को अपेक्षाकृत कम महत्व मिला है। प्रस्तावित पुस्तक का शीर्षक ‘Children in Partition Literature of Indian Subcontinent’ है। इसका संपादन महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय, भारत के कश्यप दीपक कर रहे हैं। यह पुस्तक रूटलेज की ‘South Asian Literature in Focus’ श्रृंखला का हिस्सा बनने के लिए प्रस्तावित है। पुस्तक की अवधारणा के अनुसार, विभाजन साहित्य में सआदत हसन मंटो, अमृता प्रीतम, खुशवंत सिंह और भीष्म साहनी जैसे चर्चित साहित्यकारों पर व्यापक शोध हुआ है, लेकिन उनके अलावा अनेक क्षेत्रीय भाषाओं में लिखी गई ऐसी कहानियां, कविताएं, उपन्यास और नाटक हैं, जिनमें बच्चों की पीड़ा और मनोवैज्ञानिक स्थिति को विशेष रूप से दर्शाया गया है। इन रचनाओं को अभी तक पर्याप्त अकादमिक पहचान नहीं मिल सकी है। इस संदर्भ में मंटो की ‘यजीद’, ‘हरमीत कौर’, ‘मह्मूदा’ और ‘खुदा की कसम’ जैसी कहानियों के साथ भीष्म साहनी की ‘पाली’, इस्मत चुगताई की ‘जड़ें’, राजिंदर सिंह बेदी की ‘अपने दुख मुझे दे दो’ और गुरमुख सिंह मुसाफिर की ‘The Abandoned Child’ जैसी रचनाओं का उल्लेख किया गया है। इसके अलावा हिंदी, पंजाबी, उर्दू, बंगाली, सिंधी और हरियाणवी साहित्य को भी शोध के दायरे में शामिल करने की योजना है। पुस्तक में साहित्य के साथ-साथ सिनेमा, रंगमंच, लोकगीत, मौखिक इतिहास, आत्मकथाओं, कविताओं और रेडियो नाटकों के माध्यम से विभाजन के दौरान बच्चों की स्थिति को समझने का प्रयास किया जाएगा। ‘बुनियाद’ जैसी टेलीविजन श्रृंखला और विभाजन पर आधारित शुरुआती फिल्मों में बच्चों के अनुभवों को भी अध्ययन का हिस्सा बनाने की बात कही गई है। इस पहल का मुख्य उद्देश्य उन आवाजों को सामने लाना है, जो विभाजन के इतिहास में अक्सर हाशिये पर रह गईं। खासकर क्षेत्रीय भाषाओं की अप्रकाशित या अंग्रेजी में अनूदित नहीं हुई रचनाओं को अकादमिक चर्चा में शामिल करना इस परियोजना का महत्वपूर्ण पक्ष है। शोधार्थियों और साहित्यकारों के लिए अवसर इस पुस्तक के लिए 250 शब्दों का शोध-सारांश (Abstract), संक्षिप्त परिचय और प्रकाशित शोध कार्यों का विवरण 20 दिसंबर 2026 तक आमंत्रित किया गया है। चयनित प्रस्तावों की सूचना 30 दिसंबर 2026 को दी जाएगी, जबकि पूर्ण पांडुलिपि जमा करने की अंतिम तिथि 26 फरवरी 2027 निर्धारित की गई है। इच्छुक शोधार्थी अपना प्रस्ताव MS Word फाइल में childpartition@gmail.com पर भेज सकते हैं। यह पहल विभाजन के इतिहास को केवल राजनीतिक घटनाक्रम या सांप्रदायिक हिंसा के रूप में देखने के बजाय उन बच्चों की नजर से समझने का प्रयास है, जिनका बचपन इस त्रासदी में कहीं खो गया था। https://acrobat.adobe.com/id/urn:aaid:sc:AP:9dea3c8d-370d-46d1-b559-cf24e96d6d3b Share this: Share on X (Opens in new window) X Share on Facebook (Opens in new window) Facebook Like this:Like Loading… Related पोस्ट नेविगेशन BRVAS: कार्यकारिणी का विस्तार सफलतापूर्वक संपन्न ऑरो यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर और असिस्टेंट प्रोफेसर के पदों पर भर्ती, बिजनेस से लेकर लॉ और लिबरल आर्ट्स तक में अवसर